अक्सर एक स्वैटर बुना करती थी वो.
अरे! दूध उबल गया,
वो ऊन का गोला हाथ में समेटे दौड़ पड़ती थी,
रास्ते में ही छूट भी जाता था वो गोला हाथ से,
सब उलझ जाता था..
जिसे सुलझाने में घंटो बीत जाया करते थे उसके,
मगर वो सुलझाना पसंद था उसे...
अक्सर एक स्वैटर बुना करती थी वो.
सहेलियां बहुत सी थी उसकी,
धूप में अकसर चारपाई पर बैठकर गप्पे मारा करती
थी,
दोनो हाथ स्वैटर बुनते रहते और हज़ारों बातें
चलती,
हाथ मानो किसी कंप्यूराइज़्ड प्रोग्राम की तरह
हों,
बीच-बीच में मूंगफली के छिलके उतारने के लिए,
सिलाई बगल में रख दिया करती थी और फिर,
वही गप्पें.. वही हंसी.. वही बातें.. वही
स्वैटर...
अक्सर एक स्वैटर बुना करती थी वो.
वो स्वैटर... कभी पूरा नहीं होने दिया उसने वो
स्वैटर...
जैसे ही पूरा होने लगता.. उधेड़ देती...
फिर नए सिरे से बुनाई की शुरुआत...
अजीब पागल थी..
मगर उसे पसंद था वो पागलपन...
उसे पसंद था वो स्वैटर... उसके लम्स (छुअन) का
एहसास...
वो स्वैटर किसी के इंतज़ार की निशानी था..
अक्सर एक स्वैटर बुना करती थी वो...

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