Follow @kReativekrish kReative krish: दिसंबर की हवाएं

Thursday, February 27, 2014

दिसंबर की हवाएं

"उसे हौंसलों का सहारा दिया,
वो मुसाफिर जब कभी थकने लगा

उसके दिल का कांटा था तो निकाल दिया,
वो रिश्ता जब कभी चुभने लगा,

बिछड़ने की बात पर राज़ी हुए दोनों जहां,
फासला बढ़ता रहा दिल कहीं दुखने लगा,

मेरी आंखों को मुद्दत से लत लगी हुई थी उसकी,
अब उसकी आंखों में भी मुझे एक ख्वाब दिखने लगा,

एक लंबी जंग के बाद खामोशी पसरी है चारो तरफ,
दोनो का काफिला चलने लगा रुकने लगा

दिसंबर की हवाओं के हिस्से हैं बस बद्दुआएं,

कुछ सोचकर ये सर्द दिल फिर से दहकने लगा"

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