"सांसों में घुलती हुई सांसों का नशा,
गर्म हथेलियां बर्फीली उंगलियों को पिघलाती हुई,
एक एहसास को वो लंबी रात खुद में संभाले,
दो रूहें एक चादर में अपना जहां बसाती हुई,
सन्नाटे की खामोशी में आहों का सफर,
दिल की चाहतें जिस्म में कमसमसाती हुई,
ग़मों के कारवां की मंज़िल वो आगोश,
टूटकर उसकी बाहों में खुदको समाती हुई,
सबुह-सबुह वो उसका हसीं उखड़ा मिजाज़,
बड़ी मासूम लगती वो बिस्तर पर टूटी हुई
चूड़ियां दिखाती हुई
ना बिखरे बाल, ना फैला काजल, ना
बेतरतीब सिंदूर,
बस उसकी आंखें दिसंबर की उस रात के राज़ बताती
हुई"

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