तू जो दे दे तो सब कुबूल है,
जाम भी.. दवा भी.. ज़हर भी...
रकीबों ने रखे हैं कई मुखतलिफ नाम तुम्हारे,
कयामत भी.. ज़लज़ला भी... कहर भी...
बस एक तेरी चाहत में क्या-क्या ना तलाशा,
गांव भी.. कस्बा भी... शहर भी...
तुझे अपने वजूद का हिस्सा बना लेते हैं,
बशर भी.. शज़र भी.. शहर भी...
बस गुज़र जाता है मेरी सुनता ही नहीं कि रुक
जाए
वक्त भी.. लम्हा भी.. पहर भी...
जुदा होने की सब अपनी अलग दास्तां बयां करते
हैं,
साहिल भी.. दरिया भी... लहर भी...
ज़िंदगी बितायी कुछ इस कदर मैने,
रहा बिखरा भी... तन्हा भी... दर-बदर भी..
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