मां की याद...
फिर एक शरारत करना चाहता हूं,
तेरे हांथ का थप्पड़ खाना चाहता हूं,
साने से एक बार लगाओ तो,
फिर रसोई से बाहर भगाओ तो,
मैं फिर उन लम्हों को जीना चाहता हूं,
थक चुका हूं... मिट चुका हूं,
तेरे प्यार का अमृत पीना चाहता हूं...
यहां बहुत सी शोहरत मिली है,
कहने को बहुत इज्जत मिली है,
यहां पकवान तो बहुत है,
सड़को पे दुकान तो बहुत हैं,
मगर तेरे हांथो की रोटी नहीं है,
आंखों में सपने भरे हैं,
मगर ये कमबख्त सोती नहीं है,
एक बार घर आना चाहता हूं,
तेरे हांथ के पुलाव और
आलू के पराठे खाना चाहता हूं,
हर रिश्ते को आजमा के देख लिया है,
तुझे छोड़ हर किसी ने धोखा दिया है,
ये दुनिया तो बस रुलाती आई है,
तू मुझे दिल से बुलाती आई है,
दर्द से ये दिल बहुत भर चुका है,
यहां तो लोगो का ज़मीर भी मर चुका है,
तुझसे लिपटकर रोना चाहता हूं,
तेरे आंचल के तले सोना चाहता हूं,
मैं थोड़ जिद्दी, थोड़ पागल, थोड़ नालायक हूं,
तुझसे बस मार खाने के ही लायक हूं,
मगर अभी भी मुझमें संस्कार जमा हैं,
मुझे इस जहां में सबसे प्यारी मां है,
तुझसे दूर होकर तेरी कमी महसूस हुई है,
हर पल की तन्हाई खून चूस गई है,
वो साड़ी में तेरी मुस्कराती तस्वीर नज़र आती है,
ख्वाबों में भी तेरी परछाई नजर आती है,
मुझे याद है तेरा रात भर मेरी राह तकना,
मुझे खाना खिलाने के लिए पीछे भगना,
मेरा देर रात तक पढ़ना, तेरा दूध लेके जगना,
शरारतों पे बहुत मारा था तुमने,
फिर समझाते हुए पुचकारा था तुमने,
एक बार फिर वही डांट खाना चाहता हूं,
तुम्हारे पल्लू में खुद को छुपाना चाहता हूं,
मैं जब भी तुम्हारे पैर दबाया करता था,
दिल को बड़ा सुकून मिला करता था,
तुम मेरे नन्हे हांथो को रोक दिया करती थी,
जहां भर की दुआएं एक सांस में दे दिया करती थी,
मैं जानता हूं तुम आज भी दुआएं देती होगी,
मैं जानता हूं तुम आज भी इंतज़ार में बैठी होगी.......
---खुशकिस्मत कृष्ण

Maa chaahe kisi ki bhi kyun na ho hamesha aadarneey hoti hai.. so this poem z dedicated to all the mothers in this world...
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