शहादत- जीत की कीमत..
हमारे सैनानियों ने हर बार हमें जीत दिलाई है,
बहादुरी की ना जाने कितनी ही मिसालें बनाई है..
ऐसी ही एक दास्तां आज मुझसे सुन लो...
मगर दिमाग से पहले जज़्बात को चुन लो,
उस वक्त सियासत का नंगा नाच चल रहा था...
जब मेरे देश का “ताज” जल रहा था,
तब उन्होने धीरज बांधा था...
देश की रक्षा के लिए उनका मजबूत कांधा था,
रणबाकुरों का जत्था यूद्धभूमि में कूद पड़...
सिंह की भांति दुश्मनों पे टूट पड़ा,
वो डटे रहे क्योंकि देश रो रहा था..
आगे बढ़ते रहे जब देश सो रहा था..
गोलियों पे गोलियां चलती रहीं..
परिस्थितियां पल-पल बदलती रहीं...
एक बार तो मां की चिंता हुई होगी...
एक बार तो पिता की तस्वीर दिखाई दी होगी...
शायद बच्चों का ख्याल आया हो...
हो सकता है माशूका ध्यान आया हो...
मगर ये जज़्बा ही है जो इन्हे जांबाज़ बनाता है...
सिपाही पूरे देश को परिवार समान गले लगाता है....
आतंकियों के सामने इन वीरों की दीवार थी...
इस बार की लड़ाई आर पार थी...
धमाको पे धमाके हो रहे थे,
आतंकी भी अपना धीरज खो रहे थे,
एक सिपाही बड़ी बहादुरी से लड़ रहा था,
देश रक्षा का फर्ज बखूबी अदा कर रहा था,
वो आगे बढ़ता रहा मानो दुश्मनो का काल हो,
गुस्मे में उसकी आंखे मानो गर्म लोहे सी लाल हों,
वो आतंकियों से लड़ते लड़ते उनके करीब चला गया,
एक-एक आतंकी को मारता चला गया,
अचानक एक ऐसा वक्त भी आया,
मानो मौत सा काला... घुप्प अंधेरा छाया,
पीठ पीछे उसपे आतंकी ने गोली दागी,
जो की तेजी से सिपाही की तरफ भागी,
गोली उसके सीने में घुस गई,
दिल के किसी कोने मे छुप गई,
एक पल में क्या से क्या हो गया,
देश का एक सपूत मौत की नींद सो गया,
वो सिपाही देश को अखिरी सलाम दे गया,
साथ ही आतंकियों के अंत का पैगाम दे गया,
आखिरकार हमारी जीत भी हो गई,
मगर मेरा दिल मुझसे एक सवाल पूछ रहा है,
जिसका जवाब मुझे नहीं सूझ रहा है,
आखिर क्यूं सिपाही को ही क्यूं ये कीमत चुकानी पड़ती है,
जीत की कीमत शहादत से ही क्यूं चुकानी पड़ती है,
कृष्ण पांडेय...

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