जो नाता तोड़ना था तो ज़रा पहले बता देते,
बेवफाई की हम भी तो तुम्हे पूरी सज़ा देते,
तुम बात करते थे हमें दिलबर बनाने की,
वफा के नाम पर तुमको खुदा अपना देते,
के आई रात थी ऐसी कि अब तक ना सवेरा है,
दिलों के बीच में छाया काला घोर अंधेरा है,
मैं कैसे छोड़ दूं तुझको, मैं कैसे तोड़ दूं खुद को,
मेरी कविता के हर अक्षर में बस ऐहसास तेरा है,
मेरी आंखों में मेरा ग़म ना जाने क्यूं झलकता है,
छुपाना चाहता हूं फिर भी आंखों से क्यूं छलकता है,
कि भला हैरान क्यूं है वो जो मैं अश्कों में डूबा हूं,
मेरा दिलबर मुझे पत्थर ना जाने क्यूं समझता है,
आज महफिल के हाथों में कोई भी जाम ना होगा,
नशा तेरा फिज़ाओं में और मुझसे सामना होगा,
तुझे मेरा ही बनना है नहीं तो देख लेना तू,
कोई दिलबर नहीं होगा वफा का नाम ना होगा...
अब कुछ मस्ती भरी पंक्तियां...
मोहब्बत एक से होती है ये तो सब ही कहते हैं,
ज़िंदगी बीत जाती है जुदाई फिर भी सहते हैं,
और हमें फुरसत नहीं मिलती फकत तेरी इबादत से,
ना जाने कैसे ये पूजा, भक्ति, ज्योति में रहते हैं.

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