प्रतिज्ञा
अंतःकरण को आदर्शों के हांथो ने पकड़ लिया,लोभ वासना ने हृदय को जकड़ लिया,
मगर इस बार शिकंजे से बाहर आउंगा,
जो ली है प्रतिज्ञा तो उसे निभाऊंगा,
दुश्मनो से जीतना ही यूं रग-रग में समाया है,
इस बार दुश्मनो में खुद को खड़ा पाया है,
मैं नदी नहीं जो समुद्र में समा जाएगी,
मैं नौका नहीं जो लहरों से डर जाएगी,
मैं समय चक्र हूं, जो सदैव चलता जाएगा,
वो पथिक हूं जो स्वयं अपना पथ बनाएगा,
अपनी कमियों को नज़रअंदाज़ करते हैं लोग,
दूसरे की कमियों पर हंसा करते हैं लोग,
आज खुद पर भी हंसने का समय आया है,
अपने इष्ट को भी आजमाया है,
रोना-बिलखना मैने कभी सीखा नहीं था,
हो चाहे दर्द जितना भी, मैं कभी चीखा नहीं था,
कभी-कभी सब उम्मीद बहुत कर लेते हैं,
सारा बोझ इन नाजुक कंधों पर धर देते हैं,
ना जाने क्यूं “उसने” मुझे ये “कृष्ण” जीवन दिया,
शायद इसीलिए ये साफ मन दिया,
इन कपकपाते हाथो को अब सीने पर रखा है,
इस बार इरादा बिल्कुल पक्का है,
अंधेरे से छुपना नही मुकाबला करना है,
अंजाम चाहे जो हो अंत तक लड़ना है,
आगाज़ तो कर ही दिया है अब अंजाम तक जाउंगा,
जो ली है प्रतिज्ञा तो उसे जरुर निभाऊंगा...
-खुशकिस्मत कृष्ण

No comments:
Post a Comment