Follow @kReativekrish kReative krish: January 2010

Sunday, January 24, 2010

YE INDIA HAI......

`ये इंडिया है...


मातृभाषा हिंदी है, हांथो में चूड़ी और माथे पर बिंदी है
बीच रोड़ पर बैठी गाय है, हमारा राष्ट्रीय पेयजल चाय है
देशी वेषभूषा कुर्ता-धेती है,
खुशी हे या गम.. यहां महिलाएं बहुत रोती हैं
दुश्मनों के सामने ये सीनाताने ताने खड़ा है
उनके पास ओसामा है तो हमारा दाउद क्या कम बड़ा ह!
इसने दुनिया को बहुत कुछ दिया है
ये इंडिया है.. ये इंडिया है... ये इंडिया है..


अजी यहां ताजमहल है, गलियों में चहल-पहल है,
क्रिकेट में हम सब पर भारी है, ऑस्कर में भी बाजी मारी है,
पवित्र गंगा और हिमालय हमारी शान हैं,
देश की रक्षा के लिए हमारे बीर जवान हैं,

गर्भा और भांगड़ा यहां साथ-साथ चलते हैं,
हर गली-मोहल्ले में पहलवान पलते हैं,
विदेशियों की हड्डियों को कई बार चटका है,
खली ने ना जाने कितनों को रिंग में पटका है,
मगर साथ ही हमने गीता को भी माना है,
पंचशील के सिद्धांतो को भी जाना है,
हमने इंसानियत को खुलकर जिया है..
ये इंडिया है... ये इंडिया है... ये इंडिया है..




मगर! जरा एक पहलू ये भी देखिये....
हम लोग जो है...
बस गालियां खूब देते हैं, चलते-चलते रास्ते पर थूक देते हैं,
घरवाली को जमकर कूटते हैं, खुल्लेआम सिगरेट सूटते हैं,
तो क्या हुआ जो गंदगी फैलाते हैं,
अजी! अपने देश में हैं आपके में तो नहीं आते हैं,
हम ट्रैफिक के नियम नहीं पालते, हम तो कुत्ते पालते हैं,
हम वैलेंटाइन डे पे लड़कियां नहीं ताड़ते हैं,
हिंदुस्तानी हैं! होली पे उनके कपड़े फाड़ते हैं,
हमारी एकता के नज़ारे हर कहीं देखने को मिल जाते हैं,
घूस के पैसे को मिल-बांटकर ही खाते हैं,
भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, और घूसखोरी को हम बढाते है,
फिर देश के दुश्मन ही हमें चिढाते हैं,
मर-मर कर हर पर जीते हैं, जी-जी कर हर पर मरते हैं,
मगर इन गलतियों से हमने अब ये सबक लिया है,
अब वो करना है जो अब तक ना किया है...
यही मेरे सपनों का इडिया है...
ये इंडिया है.. ये इंडिया है... ये इंडिया है..


-खुशकिस्मत कृष्ण

KLPD

KLPD

दिलबर... जान... सनम... तो कभी जानम कहा करता था,

दिन-रात उसके खयालों में डूबा रहता था,

उसकी हर मुस्कान से दिल पर कहर सा ढा जाता था,

मुझे क्या पता था ये बकरा हलाला होने से पहले पुचकारा जाता था,

क्या बताऊं क्या माल थी वो,

कहने का मतलब कमाल थी वो,

याद करता हूं वो किस तरह से पटी थी,

बड़ी मुश्किलों से सैट हुई थी,

उसके हुस्न पर हमने कई कविताएं लिख डाली थी,

क्या खूब उसका यौवन, रुप और गालों की सुर्ख लाली थी,

जो भी लेटेस्ट गाना आया करता था,

दिन-रात हमारे मोबाइल में बजा करता था,

हर रोमेंटिक फिल्म की स्टोरी मानो अपनी ही लगती थी,

उसे किसी और के साथ देखता तो मेरी बड़ी सुलगती थी

बड़ी ही सात्विक थी वो मंदिर जाया करती थी,

हर सोमवार एक नई चप्पल पार कर लाया करती थी,

काफी शेरदिल थी वो किसी से नहीं डरती थी,

खुल्लेआम सुट्टे के कश भरती थी,

बस एक दिन वोडका के पैसे ना देने पर मुझसे रुठ गई,

उसी दिन से हमारी सैटिंग टूट गई,

पूरी ज़िंदगी इश्क को इबादत और दिलबर को खुदा कहता रहा,

जब से उसने साथ छोड़ा इश्क अब कमबख्त हो गया और

सनम को बेवफा कहने लगा..

इस महफिल में कई टूटे दिलों का दर्द हरा हुआ होगा,

सभी ने अपना हांथ सीने पर धरा होगा,

मगर अपने देश में दर्जन के हिसाब से दीवाने मिलते हैं,

हर घड़ी, हर मोड़ पर अरमानों के चमन खिलते हैं,

ये एहसास हमे KLPD के बाद हुआ है,

KLPD मतलब-Kई Lड़कियां Pटा Dआलने के बाद,

ये एहसास हमे कई लड़कियां पटा डालने के बाद हुआ है,

खुदा हर किसी को अपनी मोहब्बत से मिलाए यही बस दुआ है...

GHANTA

 “घण्टा”
मंदिर में, बस में, सड़क पर सब जगह “घण्टा” है,
ये वो चीज़ है जिससे सभी का काम काम बनता है,
मगर फिर भी इसे गाली ही समझती जनता है,
अजी! ये मन्नत पूरी कराता है,
सोए हुए मुसाफिरों को जगाता है,
राहगीरों को राह दिखाता है,
जी ये “घण्टा” है....


कुछ बुरा हो जाए या फिर
लैक्चर से दिमाग पक जाए,
किसी पर गुस्सा आ जाए
तो जुबां से निकलने वाला
Common सा लफ्ज़ “घण्टा” है...

बिल्ली जैसे अफसर के गले में बंधना हो,
या फिर भगवान की प्रार्थना हो,
यारी-दोस्ती में किसी को कुछ कहना हो,
तो मौजूद “घण्टा” है...

हमेशा बजता रहता है,
किसी से कुछ नहीं कहता है,
सारे ग़म अकेले सहता है,
फिर भी कितना खुश दिखता है,
जी हां, भाईसाहब ये “घण्टा” है...

घण्टा हमे बहुत कुछ बताता है,
हर हाल में खुश रहना सिखाता है,
बिना जिसके हम अधूरे होते हैं,
जिससे हमारे कई काम पूरे होते हैं,
वो “घण्टा” है,

अगर आपको ये कविता अच्छी लगी तो आप “वाह” कहेंगे,
और अगर घटिया लगी तो...
आपके मुंह से भी निकलने वाला अगला शब्द “घण्टा” है...
-खुशकिस्मत कृष्ण

pratigya

प्रतिज्ञा
अंतःकरण को आदर्शों के हांथो ने पकड़ लिया,
लोभ वासना ने हृदय को जकड़ लिया,
मगर इस बार शिकंजे से बाहर आउंगा,
जो ली है प्रतिज्ञा तो उसे निभाऊंगा,
दुश्मनो से जीतना ही यूं रग-रग में समाया है,
इस बार दुश्मनो में खुद को खड़ा पाया है,
मैं नदी नहीं जो समुद्र में समा जाएगी,
मैं नौका नहीं जो लहरों से डर जाएगी,
मैं समय चक्र हूं, जो सदैव चलता जाएगा,
वो पथिक हूं जो स्वयं अपना पथ बनाएगा,
अपनी कमियों को नज़रअंदाज़ करते हैं लोग,
दूसरे की कमियों पर हंसा करते हैं लोग,
आज खुद पर भी हंसने का समय आया है,
अपने इष्ट को भी आजमाया है,
रोना-बिलखना मैने कभी सीखा नहीं था,
हो चाहे दर्द जितना भी, मैं कभी चीखा नहीं था,
कभी-कभी सब उम्मीद बहुत कर लेते हैं,
सारा बोझ इन नाजुक कंधों पर धर देते हैं,
ना जाने क्यूं “उसने” मुझे ये “कृष्ण” जीवन दिया,
शायद इसीलिए ये साफ मन दिया,
इन कपकपाते हाथो को अब सीने पर रखा है,
इस बार इरादा बिल्कुल पक्का है,
अंधेरे से छुपना नही मुकाबला करना है,
अंजाम चाहे जो हो अंत तक लड़ना है,
आगाज़ तो कर ही दिया है अब अंजाम तक जाउंगा,
जो ली है प्रतिज्ञा तो उसे जरुर निभाऊंगा...
-खुशकिस्मत कृष्ण

MAA- KHUDA KA AKS

मां की याद...

फिर एक शरारत करना चाहता हूं,
तेरे हांथ का थप्पड़ खाना चाहता हूं,
साने से एक बार लगाओ तो,
फिर रसोई से बाहर भगाओ तो,
मैं फिर उन लम्हों को जीना चाहता हूं,
थक चुका हूं... मिट चुका हूं,
तेरे प्यार का अमृत पीना चाहता हूं...

यहां बहुत सी शोहरत मिली है,
कहने को बहुत इज्जत मिली है,
यहां पकवान तो बहुत है,
सड़को पे दुकान तो बहुत हैं,
मगर तेरे हांथो की रोटी नहीं है,
आंखों में सपने भरे हैं,
मगर ये कमबख्त सोती नहीं है,
एक बार घर आना चाहता हूं,
तेरे हांथ के पुलाव और
आलू के पराठे खाना चाहता हूं,

हर रिश्ते को आजमा के देख लिया है,
तुझे छोड़ हर किसी ने धोखा दिया है,
ये दुनिया तो बस रुलाती आई है,
तू मुझे दिल से बुलाती आई है,
दर्द से ये दिल बहुत भर चुका है,
यहां तो लोगो का ज़मीर भी मर चुका है,
तुझसे लिपटकर रोना चाहता हूं,
तेरे आंचल के तले सोना चाहता हूं,

मैं थोड़ जिद्दी, थोड़ पागल, थोड़ नालायक हूं,
तुझसे बस मार खाने के ही लायक हूं,
मगर अभी भी मुझमें संस्कार जमा हैं,
मुझे इस जहां में सबसे प्यारी मां है,
तुझसे दूर होकर तेरी कमी महसूस हुई है,
हर पल की तन्हाई खून चूस गई है,
वो साड़ी में तेरी मुस्कराती तस्वीर नज़र आती है,
ख्वाबों में भी तेरी परछाई नजर आती है,
मुझे याद है तेरा रात भर मेरी राह तकना,
मुझे खाना खिलाने के लिए पीछे भगना,
मेरा देर रात तक पढ़ना, तेरा दूध लेके जगना,
शरारतों पे बहुत मारा था तुमने,
फिर समझाते हुए पुचकारा था तुमने,
एक बार फिर वही डांट खाना चाहता हूं,
तुम्हारे पल्लू में खुद को छुपाना चाहता हूं,

मैं जब भी तुम्हारे पैर दबाया करता था,
दिल को बड़ा सुकून मिला करता था,
तुम मेरे नन्हे हांथो को रोक दिया करती थी,
जहां भर की दुआएं एक सांस में दे दिया करती थी,
मैं जानता हूं तुम आज भी दुआएं देती होगी,
मैं जानता हूं तुम आज भी इंतज़ार में बैठी होगी.......
---खुशकिस्मत कृष्ण

Saturday, January 23, 2010

"HALLAT AISE HAIN K BECHAINI DIL SE JATI NHI,
EK MANZILEN HAIN K RAAHEN DIKHATI NHI,
LOG ZINDAGI KI DUAAEN MAANGTE HAIN,
OR EK HUM HAIN JINHE MAUT TAK BHI AATI NHI..........."
NO!!!!!!! NO! M NOT A PESIMIST... BUS KUCH LOGO K KHYAL AISE HOTE HAIN....

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