प्यार मांगे पनाह
“मोहब्बत और जंग में सब जायज़ है”-मगर जब मोहब्बत ही जंग की बजह बन जाए तो? अपने देश में वैलेंटाईन डे पर अपनी बहन के साथ भी घर से बाहर निकलना एक जंग के ही समान है. हम इतने प्रगतिशील देश के निवासी है. बिकास पर हर तरफ ध्यान दिया जा रहा है. मगर असलियत कुछ ये है कि आज भी हम दखियानूसी लिबास को बिकास के नारे से छुपाना चाहते है. भारत में वैलेंटाइन डे मनाना एक तरह का जुर्म ही समझा जाने लगा है. धार्मिक संगठन इस मुद्दे को गर्माकर अपना राजनैतिक उल्लू सीधा करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहते. चाहे भले ही कुछ दिन बाद यही समाज के ठेकेदार होली, जो कि हिंदू धर्म का एक बड़ा त्यौहार है, में गली-मोहल्ले की लड़कियों को गुलाल लगाने के बहाने छेड़े.
भारत वो देश है जिसने ना सिर्फ दुनिया को प्यार करना सिखाया बल्कि प्यार को हर धर्म हर मजहब से ऊपर माना. उस भारत देश में आज हाल ये है कि अगर किसी युगल जोड़े को एक साथ देख लिया जाता है तो बस ये समझ लीजिए कि उनकी शामत आ गई. वैसे तो ये धार्मिक संगठन गांधीगिरी में विश्वास रखते हैं मगर जब बात उनके धर्म की हो तो वे भी तुरंत नरम दल छोड़कर गर्म दल का अनुसरण करने लगते है. अरे! माना कि प्यार जताने का कोई एक दिन या एक समय तय नहीं किया जा सकता, प्यार तो वो त्यौहार है जिसे जिंदगी के हर पल जीना चाहिए. मगर इस तरह से प्यार का अनादर करना कहां तक ठीक है? कोई धर्म या मजहब प्यार या प्यार करने वालों से नफरत करने का पाठ तो नहीं पढ़ाता. फिर ये दरिंदगी किसलिए? क्या प्यार जैसे निर्मल और पवित्र अनुभव को इससे दूर नहीं रखा जा सकता?
कुछ लोग ये तर्क भी दे सकते हैं कि वैलेंटाइन-डे तो मार्किट का बनाया त्यौहार है. तो मैं उनसे बस ये पूछना चाहुंगा कि आज ऐसा कौन सा त्यौहार है जो मार्किट से अछूता रह गया है? चाहे वो होली के रंग हों या दिवाली के पटाखे, चाहे ईद की मिठाइयां हों या क्रिसमस के तोहफे, सभी पर मार्किट ने कब्जा कर रखा है. फिर अकेले वैलेंटाइन-डे पर ही सारा गुस्सा क्यों उतारा जाता है. किसी को ये त्यौहार मनाने के लिए दबाव नहीं दिया जाता. जिसकी इच्छा होती है और जो जितना समर्थ होता है वैसे ही इस त्यौहार को मनाता है. हर त्यौहार का एक ही मकसद होता है कि रिश्ते गहरे हों और लोगों में आपसी प्यार और सदभवना बढ़े. फिर भी प्यार के इस सबसे बड़े उत्सव को मैला किए बिना नहीं छोड़ा जाता.
धार्मिक संगठन ये दलील भी देते हैं कि युगल जोड़े अश्लील हरकते करते हैं जिससे आम जनता को बहुत परेशानी होती है. तो क्या कुछ लोगों की करनी की सज़ा सभी को भुगतनी होगी? ऐसे लोगों के खिलाफ बाकायदा कानून बनाए गए हैं और जिस किसी को भी ऐसे लोगों से परेशानी हो वो खुद उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकते हैं. मगर शायद इन राजनीतिक दलों और धार्मिक संगठनों का कानून पर से विश्वास उठ गया है और अपनी संस्कृति को बचाने का जिममा इन्होने अपने सिर ले लिया है. चाहे फिर कानून को ही अपने हांथों में क्यों ना लेना पड़े.
आज प्यार जिसे कभी सभी ओर फैलाने की बात होती थी वही प्यार खुद बचने के लिए पनाह मांग रहा है. कानून वायदा तो करता है पर नफरत की आग में प्यार आखिरकार कब तक बच सकता है? मेरा मानना है कि ना सिर्फ इस परेशानी का हल बल्कि हमारे देश की हर परेशानी का हल नए कानून बनाना नहीं बल्कि कानून का पालन करना है. मै तो यही कामना करता हूं कि इस बार के वैलेंटाइन-डे पर जहां देखूं बस प्यार देखूं, प्यार पर अत्याचार नहीं.
बद्किस्मत कृष्ण
