Follow @kReativekrish kReative krish: October 2012

Monday, October 29, 2012

और सही

एक दिन, एक रात, एक ज़िंदगी तेरे नाम और सही,
मोहोब्बत की एक हसीं शाम और सही,
माना कुछ गुस्ताखियां भी हमसे हुई हैं,
चलो मेरे सिर एक इल्ज़ाम और सही,
वो मंज़िल नही कि जिसके पीछे दौड़ रहे थे हम-तुम,
ज़िंदगानी के सफर में ये एक मुकाम और सही,
तेरे रुप को तराशा है मेरे पागलपन ने जाना,
तेरे मरमरी बदन का एक गुलाम और सही,
मुकम्मल हो गई तेरी बाहों में सिमटी हुई मेरी शख्सियत,
तेरे दिल से मेरे दिल तक पहुंचता एक पैगाम और सही,
उस इक पल में तेरे इश्क ने संवार दिया मुझको,
तेरे लबों से जो पीनी हो तो एक जाम और सही,
कुछ कमी रह गई थी शायद मेरे अंदाज़-ए-बयां में,
चलो अगली बार कुछ इंतज़ाम और सही,
मेरे हमसफर तूने मेरा साथ दिया है यहां तक तो आगे भी दे,
मेरी हमनफस तेरा बस इतना सा एहसान और सही,
मेरे रकीब के हांथों मे तेरा हांथ था मै कैसे नज़रे मिलाता तुझसे,
मैने सिर झुका लिया कि आज फिर तेरा एहतराम और सही,

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